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दुध पिलाना
बच्चो को मां का दुध पिलाने की परंपरा पुरानी है। जब बच्चे जन्म लेते है तो उसको मां दुध पिलाती है और बच्चे दुध पीना सीख भी जाते है। समय के साथ किये गये अध्ययन से पता चला है कि दुध पिलाने वाली माता को कुछ खास वातों का ध्यान रखना जरुरी है जिससे की दुध पिलाने से होने वाली समस्या का सही समाधान हो सके और बच्चे का विकास समय के साथ सही से हो।
बच्चो के दुध पिलाते समय बरतने वाली सावधानीयाः
- दुध पिलाते समय बच्चे के सर को उंचा रखें और पैर को निचा रखे जिससे की दुध उसके पेट मे आसानी से जा सके। बच्चे का सर सीधा या निचे के तरफ रहने से दुध नाक मे जाने की आशांका रहती है जिससे की बच्चो को संक्रमण हो सकता है।
- नेपल यानी की दुध को मुंह मे लेने के बाद बच्चो के नाक छाती के पिछले भाग से बंद होने की संभावना रहती है जिससे की बच्चो को सांस लेने मे कठीनाई हो सकती है। इसलिए दुध पिलाते समय इस बात का पुरा ख्याल रखे।
- यदि बच्चो को बाहर का दुध पिलाना परे तो बकरी का दुध को सबसे अच्छा माना गया है। इसके बाद गाय का दुध होता है। इसको पिलाने से पहले इसमे साफ पानी मिला दें क्योकि बच्चे के मां का दुध पतला होता है। यदि आप गाय को दुध बिना पानी का देंगे तो बच्चो को पेट खराब होने की आशंका रहती है।
- बच्चो को वासी या छह घंटे के बाद का उबला हुआ दुध नही दें क्योकी दुध को छह घंटे से पहले उबालने पर उसमे उत्पन्न होने वाले जीवाणु मर जाते है और यह बच्चो के लिए ये लाभदयक होता है। दुध के उपर जमने वाला फैट हटा देना चाहिए।
- दुध पिलाने वाली माता को अधिक सर्दी और गर्मी के शिकायत से बचना चाहिए क्योकि मां को होने वाले सर्दी जुकाम बच्चो को भी हो जाता है इससे बच्चो की समस्या बढ़ सकती है।
- दुध पिलाने वाली महिला को अपने खान – पान का पुरा ख्याल रखना चाहिए जिससे की बच्चो को दुध मे सही पोषक तत्व मिल सके और जच्चा बच्चा दोनो के सेहत सही रहे।
- बच्चो के बढ़ती उम्र के साथ उसके भोजन को भी बढ़ाने की जरुरत है। शुरुआत मे दुध के अलावा ब्च्चो को दलीया का पानी दिया जा सकता है धिरे-धिरे बच्चो के खान-पान मे ठोस पादार्थ के मात्रा को बढ़ाने की जुरुरत है।
- बच्चो को सुद्ध और स्वच्छ आहार ही दे जिससे की बच्चो के विकाश सही सरह से हो सके। बाहर से मिलने वाले बहुत सारे प्रडक्ट दिये जा रहे है लेकिन कोई भी प्रडक्ट पाकृतिक दुध का स्थान नही ले सकता है।
- मातृत्व का संवंध ब्च्चो के लिए एक बरदान से कम नही है। इसलिए अपना दुध पिलाना से परहेज नही करना चाहिये जिससे की बच्चो के सर्वागिंण विकाश मे किसी तरह की बाधा ना हो।
दुध पिलाने वाली महीला मे कई तरह की भ्रातियां फैली हुई है जिससे की महीला आशंकित रहती है विशेषकर दुध पिलाने को लेकरके। कहां जाता है कि लगातार दुध पिलाने से छाती के आकार मे ज्यादा बृद्धी हो जाती है और यह ढ़ीला परने लगता है जिससे महीला का वाहरी बनावट प्रभावित होता है। इसके लिए कुछ मातायें अपने बच्चो को बाहरी दुध ही पिलाते है। यबकि यह पुरी तरह से गलत है। छाती के सही आकार के लिए इसका व्ययाम करे जिससे ये सही हो जायेगा। छाती का आकार उसके अपने वंशानुगत व्यवस्था पर निर्भर करता है। इसलिए अपने बच्चो को दुध लगातार पिलाते रहें।
कम से कम छह महीने तक तो अपने बच्चो को अपना दुध जरुर पिलाये आगे के लिए आप अपने सुविधा के हिसाव से निर्धारित कर सकते है। दुध बच्चो को छोड़ने के लिए एकाएक बच्चो को दुध पिलाना बन्द न करे। इसके लिए पहले दो बार यानी की सुवह शाम दुध पिलाये फिर एक बार शाम के समय दुध पिलायें। इसके बाद जब शाम के समय बच्चो खेलने लगे तो उसका ध्यान भटकाने का प्रयास करे और दुध पिलाना बंध कर दे। इससे दुध बनने की मात्रा भी धिरे-धिरे कम हो जायेगी और किसी तरह की परेशानी भी रही होगी।
जिद्दी बच्चो को दुध पिलाने से रोकने के लिए अपने छाती के नेपुल पर नीम के पत्ते का लेप लगावे तथा बच्चों के दिलासा दे कि ओ शाम को दुध पिलायेगी जिससे उसके विचार को सकारात्मक प्रभाव परेगा और उसके भुख नियंत्रण करने की क्षमता पर अनुकूल प्रभाव परेगा।
लेखक एवं प्रेषकः डॉ अमर नाथ साहु
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