Adarsh Homoeo Clinic.com Festival अंतर्राष्ट्रीय हकलाना जागरुकता दिवस

अंतर्राष्ट्रीय हकलाना जागरुकता दिवस

अंतर्राष्ट्रीय हकलाना जागरुकता दिवस

हकालने की प्रक्रिया बच्चो और बड़ो दोने मे देखा जाता है। किसी मे कम तो किसी मे बहुत ज्यादा होता है। किसी-किसी व्यक्ति में तो काफी कोशीश के बाद कुछ बात निकल पाती है तो कुछ शब्द वैसे ही बोल जाते है। हकलाने की क्रिया को समाज और परिवार मे अच्छा नही माना जाता है। कई फिल्मों मे भी हकलाने और तुतलाने की क्रीया का मिमिक्री करके रोमांस किया जाता है। इससे हास-परिहास की व्यवहार से वास्तविक तौर पे हकलाने वाले की सम्मान को ठेस पहुँचता है क्योकि वो कुछ कर ही नही सकते है। हलांकी वे बोलने के लिए कोशीश जरुर करते है लिकिन नही हो पाता है।

व्यवहारिक जीवन मे इस तरह के व्यक्ति के साथ भेद भावपुर्ण व्यवहार करना ठीक नही है वल्कि उसके साथ सहानुभूति बरतने की जरुरत है। हकलाने वाले को बीमारी के श्रेणी मे रखा जाता है। यह तीन कारणो से हो सकता है। पहला है विकासात्मक हकलाना यह प्रक्रिया बच्चो मे देखा जाता है जब वो बोलना सिखते है। इसमे मस्तिष्क की भाषा और वोलने की प्रक्रिया के बीच तालमेल नही बन पाता है जिससे शब्द का उच्चारण सही नही रहता है। इसमे भी कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलता है। इस तरह के प्रक्रिया बच्चों के बड़े होने के बाद ठीक हो जाता है। कुछ बच्चो को ज्यादा समय लगता है तो कुछ जल्दी ही सिख जाता है।

दुसरा है न्यूरोजेनिक इसमे चोट, स्ट्रोक, आधात, ट्यूमर तथा लकवा की स्थिती के कारण मस्तिष्क को हानि पहुचती है जिससे कारण बोलने वाले भाग सही तरह से कार्य नही कर पाते है जिससे की अंगों के बीच कोवोरडीनेशन यानि की समन्यवय नही बन पाता है जिससे की हकलाने की क्रिया को देखा जाता है। तीसरा है साइकोजेनिक इसमे गंभीर भावनात्मक आधात और गंभीर तनाव के कारण मस्तिष्क के बोलने कि नियंत्रण करने वाली भाग को हानि पहुँचती है जिससे कारण हकलाने की क्रिया होता है।

हकलाने वाले व्यक्ति को जब बोलने मे दिक्कत महुसुस होती है तो वो बोलने मे जल्दबाजी करने लगते है जिसके कारण उसको हकलाने की क्रिया और बढ़ जाती है। मन मे बिचार तो उठता सही है यानि की बोलने बाली प्रक्रिया बनती है लेकिन बोकल कर्ड तक मैसेज सही नही पहुँता है तो हकालाने की क्रिया होती है। इसको यदी थोड़ी देरी से ही सही बोलने के लिए समय लेकर कोशीश करके बोला जाय तो अच्छा होगा इसको कहते है स्पीच थेरेपी जिसमे प्रभाविक व्यक्ति को अभ्यास कराया जाता है।

बोलने से पहले मन को स्थिर करने की जरुरत है जिससे की बोलने के लिए उतपन्न होने वाले भाव को बोलने वाले मांस्पेशियों तक संदेश पहुँच सके और बोलने की क्रिया सही हो सके। अभ्यास से भी हल्की गड़बड़ी ठीक हो सकती है।

इस तरह के व्यक्ति के साथ बातचीत करते समय धौर्य रखना चाहिए जिससे की उसको बोलने का पुरा मौका मिले और उसकी इस प्रक्रिया मे सुधार हो सके। किसी आसाध्य बीमारी के लिए इलाज कराया जा सकता है। लकबा, ट्यूमर, स्ट्रोक आदि के लिए उपयुक्त इलाज की जरुरत होती है। होमियोपैथिक मे भी दवा आती है जिससे की इस तरह की क्रिया को ठीक किया जा सकता है। इसमे प्रमुख दवा Stramonium है जिसको रोगी के बीमारी गुणवत्ता के हिसाब से दिया जाना चाहिए जिससे की बीमारी ठीक हो सके।

22 अक्टूबर के बिशेष दिन को जनजागरुकता के लिए बनाया गया है जिससे की हकलाने वाले के प्रति लोगे के रबैये मे साकारात्मक बदला हो और उनको सम्मन से जीने के लिए भरपूर सहयोग मिले। उनका मजाक ना उड़ाया जाय।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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  • ट्रोमा का इलाज सही से करने से रोगी पुरी तरह से ठीक हे जाता है।
  • मनसिक स्वास्थ्य से कई तरह के आसाध्य रोग को ठीक किया जा सकता है।
  • विधिर लोगो के प्रति सहानुभूति रखने की जरुरत है।

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