Adarsh Homoeo Clinic.com त्वचा सफेद दाग

सफेद दाग

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सफेद दाग

सफेद दाग त्वचा का एक रोग है जिसमे त्वचा का समान्य रंग बदलने लगता है। पहले त्वाचा का रंग फिका परने लगता है। इसके बाद हल्का लाल होता जाता है। फिर हल्के सफेद रंग का होने लगता है। यह पहले एक छोटा बंदू की तरह का होता है। धिरे-धिरे इसका आकार बढ़ने लगता है। इसकी बृद्धी समान्यतया बहुत धीमे होती है लेकिन लगातार यह बढ़ते रहता है। यह शरीर के किसी भी भाग मे हो सकता है। समान्यतया हाथ पैर या फिर पेट आदि मे पहले निकलता है।

  त्वचा संक्रमण की ये शिकायत आने से पहले शरीर मे बहुत तरह के त्वचा के विमारी को होते देखा गया है जो समय के साथ होते और ठीक होते भी रहते है लेकिन इसको ठीक होना नही कहते है क्योकि त्वचा की कुछ खास विमारी दव जाती है और फिर यह दुसरे रुप मे हो जाती है। एक लम्बी प्रक्रिया चलने के बाद ये विमारी अपनी रुप दिखाने लगता है।

  शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लगातार कम होने या फिर शरीर के संवेदनशील होने के कारण भी इस तरह की विमारी हो जाती है। इसका वंशानुगत लिंक भी देखा गया है। लेकिन अबतक की जानकारी के हिसाव से इसको संक्रमण ही माना जाता है। कुछ फंगल संक्रमण इस तरह के विमारी के कारण हो सकते है।

  केश स्टडीः- इसकी शुरुआत की बात की जाय तो एक बच्चो को शुरुआती दिन मे उसके शरीर का अंतरीक तपीस बहुत रहता था। जाड़ा के समय मे भी ये बच्चा स्वेटर पहने हुए भी स्नान कर लेता था। इसके लिए इसका खास ख्याल रखना परता था। दिन मे दो बार स्नान करने के बाबजुद भी इसको स्नान करने की लगातार इक्क्षा रहती थी। गर्मी मे तो कई बार स्नान हो जाता था। उस समय छोटे-छोटे घाव का होना तथा लगातार कुछ न कुछ त्वाचा का संक्रमण होते रहना देखा गया।

   फिर एक बाल्यावस्था गुजरने के बाद उसके पेट पर हल्की सफेद दाग देखी गई। जो समय के साथ बड़ा होने लगा। इसके जांच के बाद पता चला की इसके लिवर मे सक्रमण की शिकायत थी। जिसका इलाज कराया गया। विटामिन डी की कमी भी पाया गया। लीवर के इलाज के बाबजूद भी इसके भुख को स्थाई तौर पर सही करना एक चौनोती कार्य रहा। नियमित इलाज के बाद इस विमारी के विस्तार को रोका जा सका और विमारी मे सुधार भी देखने को मिलने लगा।

  त्वचा के संक्रमण मे पहले एक छोटा से फफोला जैसा संरचना का बनना तथा इसमे कुछ मबाद जैसा निकलने के बाद इसका ठीक हो जाना पर इस स्थान पर सफेद दाग जैसा संरचना का बनाते देखा गया है। इसको रोकने के लिए लागातर दवा को दिया जाता रहा है। समय से भोजन करने और लगातार खान पान पर ध्यान देने की जरुरत होती है।

  उल्टी होने की शिकायत भी देखी गई है। यदि इलाज के दौराण दवा को एक लम्बे समय के लिए रोक दिया जाय तो विमारी उल्टी के रुप मे अपना प्रभाव दिखाती है जो बाद मे चलकर त्वचा संक्रमण को बढ़ावा देता है। कभी-कभी काफी कमजोरी के साथ मुर्क्षा की स्थिती भी देखी गई है जो मुल से भोजन की अनिक्षा के कारण उत्पन्न समस्या से होता है। यदि इस समय कुछ मीठा खाने को दिया जाय तो यह समस्या सही हो जाती है।

विमारी के विभिन्न पहलु को एक साथ जोड़कर इलाज करने से इस विमारी को रोका तो जा सकता है तथा भविश्य के लिए भी इसको सही किया जा सकता है। खान पान की सही व्यवस्था के साथ भूख की इक्क्षा को भी सही करने की जरुरत होती है। इसके लिए लगतार डाक्टर से संपर्क मे रहने की जरुरत है। यह समस्या लम्बी चलती है तो दुसरे तरह की विमारी भी सकती है जैसे की आंख की देखने की क्षमता का प्रभावित होना।

त्वचा के संक्रमण की विमारी को यदी समय के साथ सही नही इलाज किया जाता है तो ऐसा देखा गया है इसके जटिलता के होने के बाद शरीर मे तेज गर्मी लगती है और यह असहज हो जाता है। इसके लिए खास तरह की व्यवस्था करनी परती है। इसमे समय के साथ विटामिन को लेना जरुरी है। त्वचा मे सुवह की हल्की गुणगुणी धुप को लगाना जरुरी है जिससे की इसके शरीर मे विटामिन डी की जरुरत मात्रा का स्वतः ही निर्माण हो सके।

विमारी को विभिन्न पहलू के एक साथ इलाज यदि किया जाता है तो विमारी ठीक हो जाता है। दवा को सिर्फ एक तरह के इलाज तक सिमित रखने पर इलाज लम्बा चलता है और फिर उसको दुवारा होने की संवाभावना रहती है। इसलिए इस तरह के इलाज को समय पर सही तरह से करने की जुरुरत है जिससे की यह बिमारी पुरी तरह से ठीक हो जाय।

इलाज और ध्यानः समय से होने वाले विभिन्न प्रकार के विमारी का सही इलाज यदी समय पर हो जाय तो विमारी की जटीलता को होने से रोका जा सकता है। खान-पान का पुरा ध्यान रखना जरुरी है। समय पर संतुलीत आहार की जरुरत होती है जो शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए जरुरी है। संतुलिता आहार मे शरीर के जरुरत की सभी तरह के भोजन को लेना होता है जिससे की शरीर एक स्वस्थ्य व्यवस्था के साथ अपना सही विकास कर सके।

इलाजः समय से दवा लेने की जरुरत है जिससे विमारी के विस्तार तथा इलाज के प्रभाव को सही से समझा जा सके और सही समय पर ईलाज हो जाय। इस तरह के संक्रमण को नजर अंदाज करना परेशानी का कारण हो सकता है।

सावधानीः संक्रमित व्यक्ति को अपने अंगवस्त्र को सही तरह से साफ करना चाहिए। अपने कपड़े को अपने तक ही सिमित रखने चाहिए जिससे की इसके संक्रमण को रोका जा सके वैसे तो ये संक्रमण से होने वाली विमारी नही है फिर भी सावधानी वरतने की जुरुरत होती है क्योकि संपर्क मे आने वाले को संक्रमित होते देखा गया है। शायद लगातार हो रहे प्रभाव के चलते तरह के विमारी के होने की संभावना रहती है।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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