ऑटिज्म

ऑटिज्म
इसे ऑटिज्म स्पेट्रम डिसऑर्डर (ASD) कहते है। हालिया हुए अध्ययन से यहा स्पष्ट हुआ है कि इस परेशानी का संबंध अनुवंशिकी गड़बड़ी से है। इसमे तंत्रिका सबंधि गड़बड़ी हो जाती है जिसके कारण पिड़ित व्यक्ति समय से साथ सही से व्यवहार नही करता है। उसके समझने तथा तुरंत जबाव देने की समाजिक सामन्य व्यवहार मे अंतर देखा जाता है। इसमे कई तरह सी समस्या आती है इसलिए इसको स्पेक्ट्रम नाम दिया गया है। क्योकि इसके लक्षण मे बिविधता देखी जाती है। इस विविधता का कारण वहां का सामाजिक परिवेश होता है।
मस्तिष्क विकाश के समय यदि इसमे किसी तरह के विकार उत्पन्न हो जाते है तो इसका प्रभाव इस व्यक्ति पर परता है जिससे उसका व्यवहार प्रभावित होता है। जवकि इसके आंतरिक विश्लेषण पर कुछ भी विशेष गड़वड़ी नजर नही आता है तो इसके एक सुधार वादी विचार के साथ जोड़कर देखा जाता है। इस तरह की समस्या का प्रारंभिक लक्षण पहले वर्ष से लेकरके 3 साल की उम्र तक के बीच दिखने शुरु हो जाता है। जबकि कुछ बच्चे 18-24 महीने तक सामान्य रुप से विकसित होने के बाद अचानक अपने कौशल खोने लगते है।
विशेष कर समाजिक व्यवहार जैसे की दुसरो के साथ बातचीत करने या आँख से सम्पर्क बनाने मे कठिनाई होती है। देर सो बोलना या अपनी भावना को व्यक्त न कर पाना, सिमित मात्रा मे बोलना या बात को दोहराना, तेज रोशनी या कुछ विशेष स्पर्श और स्वाद के प्रति असहज होना आदि। इस तरह के विकार को यदी शुरु से ध्यान दिया जाय और इसके विकार को दुर करने की कोशीश की जाय तो इसमे बहुत बड़ा सुधार लाया जा सकता है। क्योकि विकाशात्मक प्रक्रिय के तहत शरीर स्वयं को सही करने के लिए प्रेरित होता है और यदी कोई समान्य दिक्कत है तो यह दुर हो जाती है।
इस बिमारी मे बच्चों के विकाश में देरी होने के कराण इसके निदान के लिए विश्व स्तर पर एक जगरुकता अभियान चलाना है जिससे की व्यक्ति को समय रहते सबकुछ पता चल जाय और इस समस्या से निदान के उचित उपाय समय से शुरु किये जा सके जिससे की आनेवाले समय मे उस वच्चें को समाजिक व्यवहार के प्रति ज्यादा समस्या का सामना नहीं करना परे। विश्व स्तर पर इस परेशानी के प्रति जागरुकता अभियान चलाना और इसके इलाज के उत्तम स्तर की व्यवस्था बनाना जिससे की इस समस्या को समाप्त किया जाय इसके लिए 18 जून का समय वहुत ही महत्वपुर्ण है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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