Adarsh Homoeo Clinic.com Festival सस्टेनेबल गेस्ट्रोनोमी डे

सस्टेनेबल गेस्ट्रोनोमी डे

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सस्टेनेवल गेस्ट्रोलोजी डे

सस्टेनेवल गेस्ट्रोलोजी डे खान पान रहन सहन को प्राकृतिक तरह से जीने की कला को सिखाता है जिससे की मौलिकता का विकाश हो।
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आजकल के भोज्य पादार्थ मे बिबिधता आ गई है। लोग भाती-भाती के भोजन करने लगे है। बैज्ञानिकी जानकारी के संक्षिप्त अध्ययन के बाद ही उसके खाने के मायने निकाले जा रहे है। यहां तक तो ठीक भी था लेकिन इसका बाजारीकरण होना शुरु हो गया है जिससे कई तरह की समस्या उत्पन्न हो रही है। लोगो तक जो संदेश पहुँच रहा है वह वास्तविकता से कोशो दुर है। जिसके कारण लोगो की परेशानी बढ़ने लगी है। दुषित खान पान, अर्धपका भोजन तथा कई तरह के मिलाबट वाला भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारण है। इससे बचाव  तथा जागरुकता के लिए ही इस खास दिन को चुना गया है।

  पहले लोगो को खाने पीने के अपना एक सुनियेजित व्यवहार था जिसमे प्राकृतिक भोज्य पदार्थ को प्राथमिकता दी  जाती थी जिससे स्वस्थ्य पर अनुकूल प्रभाव परता था जबकि आजकल के भोज्य पादार्थ को पैकेट मे बंद करके इसके क्षरण से रोकने के लिए इसमे कई तरह के केमिकल मिलकर बाजार मे बेचते है जिससे स्वस्थ्य की कई तरह की समस्या का सामना करना परता है।

  भोजन शुद्ध हो, स्वयं के द्वारा यदी उत्पादीत हो तो और अच्छा, खाना बनाने के पारंपरिक तैर तरीके कारण इसमे तेल मशाला का कम उपयोग होता था और स्वदिष्ट भी होता था आज इस व्यवस्था को बढावा दिया जा रहा है। पहले भारत मे बैठकर पलथी मारकर खाने का रिवाज था जो कि स्वास्थ्य के लिए सही था। सामुहिक भोजन को एक साथ पंक्ति बद्ध होकर खाना खाने की व्यवस्था को उत्तम माना जाता था जवकि आजकल की व्यवस्था है खड़े होकर खाये और एक दुसरे में कोई लगाव नही रहता है। इस तरह की व्यवस्था से बचने की जरुरत है।

 यह 18 जून का दिन लोगो में जागरुता बढ़ाने स्वयं से उत्पादित करने तथा शुद्ध और लाभकारी भोजन खाने के लिए प्रेरित करने के उदेश्य से इसे मनाया जा रहा है। जिससे की लोगो के स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव परे और लोगो मे जागरुकता आवे। जंक फुड से होनेवाले परेशानी से बचा जा सके। इसके लिए समग्र प्रयास की जरुरत है।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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