विश्व दृष्टि दिवस

विश्व दृष्टि दिवस ( World Sight Day)
भौतिक जीवन को देखकर समझने के लिए दृष्टि का होना बहुत जरुरी है। भौतिक जीवन के बिभिन्नता को बास्तविक रुप से अवलोकन करते हुए जो आंतरिक खुशी और लगाव होता है वह किसी अन्य विधी से नही होता है। देखने कि पुरी प्रक्रिया प्रकार के माध्यम से होता है।
प्रकाश की किरणें जब बस्तु से टकराकर लौटती है तो उसका उल्टा प्रतिविंब हमारे आंख के रेटिना पर परता है जहां से ऑप्टिक नर्व होते हुए संबेदी सूचना दिमाग के ओसिपिटल लोब मे जाता है। यहां पर संदेशा का विश्लेषन होता है और इसके बाद इसके पहचान के लिए एसोसियसन चैंबर मे जाकर इसकी पहचान होती है। यहां से प्रक्रिया को अंतिम निर्णय के बाद मोटर नर्व के द्वारा शरीर के संबंधित भाग को जानकारी दी जाती है।
इस पुरी प्रक्रिया मे बहुत कम समय लगता है। देखने कि क्रिया और समझने की क्रिया हमारे मन के ऊपर निर्भर करता है। हमे क्या देखना है और क्या नही देखना है इसका फैसला ही हमे ही करना होता है। इसी के हिसाव से हमारी गर्दन उस ओर घुमता है और वस्तु का अवलोकन करता है। बस्तु को देखते समय हमे कितनी देर देखना है इसका भी अवलोकन दिमाग तो करता है लेकिन फैसला भी हमारी ही होता है।
बस्तु के बिभिन्न भागो की जानकारी लेने के लिए ततछण हमारे दिमाग को जागृत करना परता है और हमारा अवलोकन की दिशा और गंभीर हो जाती है। यही अभ्यास हमे थोड़े समय मे ही बहुत सारी जानकारी दे देता है। गीता मे भी भगवान कृष्ण ने कहा है कि ऑखे तो देखती है पर क्या देखे ना देखे इसका फैसला तो खुद ही करना होता है। यह समझ ही व्यक्ति की वो पुजी है जो जीवन के आर पार देखती है और जीवन उत्सकर्ष के सोपान पर चढ़ती है।
अब देखने की क्रिया पुरी तरह से प्रकाश आधारित है इसके लिए सही प्रकाश का होना जरुरी है। कम प्रकाश पर आंख को जोड़ लगाना परता है यानी की पुपील पुरी तरह से फैल जाती है जिससे की आँख मे ज्यादा से ज्यादा रोशनी जाय यानि एक युक्ति संगत इंटेनसिटी ऑफ लाइट होनी चाहिए जिससे की बस्तु की स्पष्टता पुरी हो सके। यदी प्रकाश कम हो तो धुंधली दिखती है। इसके लिए हमे आँख और करीव ले जाना होता है।
आंतरिक घर की सज्जा भी हमारे आँख को प्रभावित करती है। रोशरी सही व्यवस्था होनी चाहिए जिससे की आसानी से देखा जा सके। आँख पर जोड़ डालने से आँख मे मसल्स पर दवाव परता है जिससे की माओपिया होने का डर रहता है। आँख की थकावट को दुर करना जरुरी होता है। यदि प्रकारश तेज हो तो आँखे को बचाव करना परता है। इसके लिए कभी-कभी गोगल्स भी लगाना परता है। जैसे की बेल्डींग वाले लोग करते है।
आँख सिलियरी मस्लस आँख को घुमाने का कार्य करती है। अधिक देर तक एक टक देखने से आँख को अधिक थकावट होती है। इसके लिए हाथ से हाथ रगरकर आँख पर रखना चाहिए जिससे की आँख के मसल्स को थोड़ी थकाबट कम होगी। आजकल मोबाईल के युग है जिसमे अपने पसंद की जानकारी की कमी नही है। मन के उत्प्रेरण के बाद आँखे खुली रह जाती है। दिमाग अवलोकन करता रहता है और समय बित जाता है। इसके कारण आँख को ज्यादा देर खुलना परता है जिससे की आँख को सुखा होने का खतरा रहता है।
आँख के सुखा रहने से आँख मे जलन होने लगती है और ये जलन आगे चलकर आँख को बहुत हानी पहुँचाती है। इसको रोकने के लिए आँख को पानी के छींटे मारना चाहिए जिससे की आँख को पानी मिले और मांसपेशियां को आराम मिले। आँख की बीमारी तेजी से बढ़ी है। बच्चो मे भी ये समस्या देखने को मलती है। इसको रोकने की जरुरत है। व्यवहारीक खेल खिलैने से खेलनी की बृति का हास हो रहा है। इसको रोकने की जरुरत है।
उम्र के हिसाव से होने वाली समस्या को छोड़ दे तो आँख की समस्या तेजी से बढ़ी है। इसका कारण प्रदुषण भी है जो हमारी आँख को नुकसान पहुँचाती है। इससे बचने की जरुरत है। खान पान का भी अच्छा ख्याल रखना है। आँख के लिए बिटामिन ए की जरुरत होती है जो आँख के रोडोप्सीन पिगमेंट को बनाती है जिससे की आँख देखने की क्रिया को करता है। इसकी कमी से रतैधी नामक रोग हो जाता है जिसे दिन के समय मे भी दिखाई नही परता है।
आँख रुपी दौलत को बचा कर रखना है। ये हमारी जीवन को उच्च आयाम के प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार है। आजकल आँख की गरबरी होने पर लेंस प्रत्यारोपन, रेटिना प्रत्यारोपन जैसा इलाज मैजूद है। आँख के लिए अब इलेक्ट्रोनिक्स व्यवस्था आ रही है जो बाहरी दृष्य को इलेक्ट्रीक सिंगलन मे बदल देगी जिसको की हमारा शरीर समझ सकता है जिससे की आँधे भी देख सकते है।
आज का दिन 08 अक्टूबर को खास तौर पे लोगो का ध्यान अपनी आँख के तरफ खिंचन के लिए बनाया गया है। जिससे की आँख की समस्या पर रोक लगाई जा सके। आज के जागरुकते के बिषय को अपनो तक प्रचारित करना होगा। मोबाईल के कम उपयोग तथा प्रकाश की सही व्यवस्था को बनाना भी जरुरी है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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