राष्ट्रीय गर्भवस्था और शिशु मृत्यु स्मरण दिवस
राष्ट्रीय गर्भवस्था और शिशु मृत्यु स्मरण दिवस
( National Pregnancy and Infant Loss Awareness Day)
शिशु मृत्यू दर को कम करने मे सफलता तो मिली है लेकिन अभी भी इसमे सुधार की जरुरत है जिससे की लोगो मे अपने बच्चे के प्रति विश्वास बन सके और सिमित जनसंख्या के लक्ष्य को पाया जा सके। इसके लिए किये जा रहे सराहनीय प्रयास को बल मिला है। इस क्षेत्र में और कार्य करने की जरुरत है। जन्म लेने वाला बच्चा स्वस्थ्य हो और बीमारी मुक्त हो इसके लिए और प्रयास करने की जरुरत है। आजकल जो उपाय उपलब्ध है वे या तो महंगे है या समान्य व्यक्ति के पहुँच से बाहर है। इसको आम व्यक्ति की पहुंच तक लाना जरुरी है जिससे की विश्वास की गुणवत्ता को बरकरार रखा जा सके।
लड़की की शादी के बाद गर्भावस्था की उम्र को 20 के ऊपर रखे। इसके शीरीरिक गठन का भी ख्याल रखा जाय। स्वस्थ्य शरीर के लिए शरीर का बजन से साथ किसी भी तरह की बीमारी ना हो इसका ख्याल रखा जाय़। यदी किसी प्रकार की बीमारी है तो इसका इलाज समय से कराकर गर्भावस्था के जरुरी मानडंड को पुरा किया जाना जरुरी है जिससे की आने वाले बच्चो की गुणवत्ता उच्च हो सके। गर्भावस्था के समय मिलने वाले खान-पान की जानकारी होनी जरुरी है जिससे की जरुरी व्यवस्था की जा सके।
गर्भावस्था के समय जरुरी खानपान का ख्याल रखना जरुरी है। इसके साथ गर्भस्त शिशु की देखभाल के लिए डॉक्टर से परामर्श लेते रहे और उनके स्वास्थ्य का पुरा ख्याल रखे। जरुरी दवाईया को समय पर देते रहे जिससे की बच्चो का सही से विकास हो सके। 3 महीना वितने के बाद बच्चे के दिमाग का बिकास होने लगता है। बच्चे अपनी मां के जरीये बाहरी बातावरण से जानकारी लेते रहता है। इसलिए बच्चे के मां के मानसिक और शारीरिक स्वस्थ्य का सही होना जरुरी है। मां के शरीर मे होने वाले हारमोनल प्रभाव से बच्चे आसानी से प्रभावित हो जाते है। इससे बचने के लिए पारिवार के माहौल का सही होना जरुरी है।
महीला का कामकाजू होना जरुरी है जिससे की बच्चे के जन्म के समय किसी प्रकार की परेशानी ना हो और बच्चे का समान्य जन्म हो सके। मांशपेशियां सही होने से बच्चे के जन्म के समय अनावश्यक परेशानी नही होती है। मां के अंदर खुन की कमी का भी ख्याल करना होता है। समय के साथ होने वाले परिवर्तन को भी सही से समझने की जरुरत है। बच्चे के अंदर किसी प्रकार की बिकृति यदी हो तो उसे समय से ठीक कर लेना जरुरी है। कई प्रकार की अनुबांशिक बिसंगतियां बच्चे मे होती है। इसकी जानाकारी यदी पहले से हो तो इससे बचाव के उपाय कीए जा सकते है। यदि समय से जानकारी हो भी जाय तो इससे बचा जा सकता है।
यदि किसी तरह की समस्या का सामना करना परे तो आनावाले समय मे इस तरह की समस्या का दुवारा सामना करना नही परे इसका ख्याल रखना जरुरी है। इससे बच्चे की मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। भारत जैसे देश मे जहां की अधिकांश जनता गांवों मे रहती है जहां आम जनता तक सही जानकारी नही पहुँच पाती है सही देखभाल के लिए जानकारी जरुरी उपाय है जिससे की समय के साथ अधिक लाभ उठाया जा सके।
बच्चे मे जन्म के समय लगाये जाने वाले टीके का भी ख्याल रखे और समय से देना जरुरी भी है जिससे की बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो और वच्चा समय के साथ होने वाले संक्रमण से बचा रहे। गर्भस्थ शिशु के मां के लिए विटामिन, कैलसियम और आयरन की गोली को खाना जरुर होता है। यदि भूख नही लग रही है तो इसके लिए भी इलाज कारना जरुरी होता है। अधिक उल्टी होने के लिए भी जरुरी दवा लेने की जरुरत होती है जिससे की शरीर को जरुरी उर्जा समय से मिल सके।
15 अक्टूबर का खास दिन इसी विषय को चर्चा का विषय बनाते हुए मुत्यु दर को कम करने के उदेश्य से समाजिक जागरुरता के लिए बनाया गया है। समाजिक जागरुकता को बनाते हुए स्वयं के लिए उचित मार्गदर्शन को पाना जरुरी भी है। इसके लिए किये जा रहे सार्थक प्रयास को बल मिलना जरुरी है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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