विश्व गठिया दिवस

विश्व गठीया दिवस (World Arthritis Day)
भारत जैसे विकासशील देश मे खान पान की उच्चता औसत स्तर की होती है। जिसमे जिवोउपयोगी बस्तु का उपयोग करते हुए जीवन यापन किया जाता है। समय पर नियमबद्ध तरीके से जांच कराना तथा उसके निर्देशानुसार स्वयं को व्यवस्थित करना एक चुनौतीपुर्ण कार्य होता है। इस कार्य को करते हुए कुछ लोग तो व्यवस्थित हो जाते है पर कुछ लोग पिछे पर जाते है। इसी व्यवस्था को पुरी करने के लिए यथासंभव प्रयास करता हुआ व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ्य रखने की कोशिश करता है।
उम्र के साथ होने वाले रोगो मे गठीया की बीमारी प्रमुख है। इसमे जोड़ो मे सूजन आ जाती है और दर्द करने लगता है। दर्द औसत स्तर से लेकरके तेज तक होती है। दर्द बढ़ने पर दवा ली जाती है और फिर दवा कुछ दिन के लिए बंद हो जाती है। ऐसा देखा जाता है कि ये बीमारी पुराना हो जाने पर दवा के द्वारा सिर्फ आराम रहता है लेकिन पुर्ण रुप से कभी ठीक नही होता है। इसी कारण से कुछ लोग दवा कुछ दिन लेते है और फिर दवा को छोड़ देते है। इससे बीमारी की जटीलता बढ़ती जाती है।
कुछ लोग उम्र का तकायजा देकर तो कुछ लोग आर्थिक कमजोरी के कारण तो कुछ को सही जानकारी नही होने के कारण इस बीमारी का सिकार हो जाते है। इस बीमारी का दयारा अब बढ़ने लगा है। कुछ ऐसे लोग भी प्रभावित होने लगे है जिसकी पहले उम्मीद नही की जाती थी। जिससे इसको नियंत्रण करने के लिए जागरुकता का होना जरुरी हो गया है। यदि जागरुकता के साथ सही तरह से और समय से इसका इलाज कराया जाए तो ये पुरी तरह से ठीक हो सकता है।
ये बीमारी पुराना होने पर जोड़ो के अंदर बनने वाली साईनोभियन फ्लूईड सुख जाता है। जिसके कारण हड् के बीच घर्षण होती है और सुजन हो जाती है जो दर्द का कारण बनती है। इसमे गर्म तेल लगाने पर आराम होता है। कुछ लोग कुछ क्रीम लगाते है तो कुछ लोग कई तरह के उपाय शुरुआत मे करते है जिससे आराम मिलता है लेकिन बाद मे ये टुटका भी काम नही करता है। इस दर्द के साथ जिन्दगी काटने की आदत के बीच व्यक्ति स्वयं को बीमार मान बैठता है।
दो हड्डी के बीच वाला ये जोड़ हड्डी के सिरे वाला भाग यानि की कॉर्टोलेज घिस जाता है जिससे की हड्डी के बीच जगह बन जाती है। ये प्रेक्रिया समय के साथ चलते रहता है और परेशानी बढ़ती जाती है। कुछ चिकित्सक हड्डी मे कैलसियम की गोली देते है साथ में दर्द निवारक गोली भी देते है तथा ह्ड़्डी को घिसने को रोकने की दवा देते है। जबकि होमियोपैथिक मे कुछ खास तरह की दवा दी जाती है जिसमे की रक्स टक्स प्रमुख है। ये दवा प्रारंभिक समय मे बहुत कारगर होती है लेकिन काफी पुराना होने पर कुछ औऱ दवा भी दी जाती है।
इस तरह के रोगी सतह को बीना दवाये उठ नही सकती है। इसको गुटने पर कम दवाव परे इसलिए ये संभलकर चलती है जिससे इनको चलने फिरने मे परेशानी होती है। इस बीमारी मे एक गाउट नामक बीमरी भी होता है जो शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ़ जाने से होती है। इसको नियंत्रण के लिए भी दवा दी जाती है। खान-पान मे परिवर्तन की जरुरत होती है। इस दिवस के इस वर्ष का थीम “अपने सपनों को सकार करें’ है। इसका तातपर्य है कि परेशानी के बाबजूद लोग अपने कार्य को यथा शक्ति करने के लिए प्रेरित हो और कार्य के प्रति निष्ठावान बने रहे।
शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने वाली प्रक्रिया को भी सुदृढ़ होना है जिससे कि इस बीमारी को रोका जा सके। अपने खान-पान से सुधार करना जरुरी है। कैलसियम की मात्रा को शरीर मे बनाये रखने के लिए जरुरी भोज्य पदार्थ लेते रहे जैसे चना आदि। प्रोटीन की मात्रा भी लेना जरुरी है जिससे की कोशीका की बाहरी परत सही रहे। विटामिन की सही मात्रा का होना जरुरी है जो कोशीका को सही तरह से नियंत्रित करे। कई तरह की आधुनिक प्राणाली आ गई है लेकिन पुर्ण तरह से किसी की भी व्यवस्था सही नही है। इसके लिए जरुरी है कि जागरुकता के साथ इसका इलाज करावे एवं स्वस्थ्य रहे।
12 अक्टूबर का खास दिन इसी बिषय को जानजागरण का अभियान बनाकर समाज को संदेश देना है कि इसका इलाज समय से करावे। अपने वजन को नियंत्रित रखे जिससे की जोड़ पर दवाव कम परे। दैनिक जीवन के कार्य के साथ व्ययाम करने से भी जोड़ सही रहता है। जोड़ो मे चोट लगने की प्रक्रिया का भी ख्याल रखे। इसका समय से इलाज करावे जिससे की इसके पुराना होने पर इसकी परेशानी ना हो। जन जागरण का ये अभियान सबके लिए खुशीयां लेकर आये इसकी हम कामना करते है और विश्वस रखते है कि इस दर्द से एक दिन सबको मुक्ति मिल जायेगी।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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